Monday, September 14, 2026

अग्र-बहनों से संवाद: 11

 



मेरी प्रिय बहनों,

कई बार हम अपने घरों में देखती हैं कि हमसे या हमारे बच्चों से कोई गलती हो जाती है। इंसान होने के नाते गलतियाँ होना स्वाभाविक है, लेकिन सबसे खतरनाक बात तब होती है जब हम अपनी उस गलती को छुपाने के लिए, या अपने अहंकार को बचाने के लिए उसका समर्थन करने लगती हैं, यानी उसे सही ठहराने की दलीलें देने लगती हैं।

इसी मानवीय कमज़ोरी पर मेरे 'Living Master' (ठाकुर जी) हमें एक बहुत बड़ी चेतावनी देते हैं। ठाकुर जी कहते हैं— "यदि तुम अपना दोष (गलती) जानकर भी उसे तुरंत छोड़ नहीं सकते, तो कम से कम किसी भी तरह उसका समर्थन करके दूसरों का सर्वनाश मत करो।"

यह कितनी बड़ी बात है बहनों! जब हम अपनी गलत आदतों या गलतियों का पक्ष लेती हैं, तो हमारे बच्चे भी वही सीखते हैं और पूरा पारिवारिक ताना-बाना बिखर जाता है। इसके विपरीत, ठाकुर जी हमें समाज को सुधारने का एक बहुत ही व्यावहारिक और जादुई तरीका बताते हैं। वे कहते हैं— "यदि तुम खुद 'सत्' (सच्चे और अच्छे) बन जाओ, तो तुम्हारी देखा-देखी हज़ारों लोग अपने आप अच्छे हो जाएंगे। लेकिन अगर तुम 'असत्' (बुरे या स्वार्थी) बनोगे, तो याद रखना कि तुम्हारी दुर्दशा पर आँसू बहाने वाला या हमदर्दी जताने वाला भी कोई नहीं बचेगा; क्योंकि अपने स्वार्थ से तुमने अपने चारों तरफ के माहौल को ही वैसा बना दिया है।"

ठाकुर जी आज के हर माता-पिता और युवा को उनकी असली ताकत और जिम्मेदारी याद दिलाते हुए कहते हैं कि यह बात गाँठ बांध लो— "तुम खुद अपने, अपने पूरे परिवार के, समाज के और पूरे देश के वर्तमान और भविष्य के लिए पूरी तरह उत्तरदायी (जिम्मेदार) हो।" हमारा एक सही कदम पूरे परिवार को तार सकता है और हमारा एक गलत कदम पीढ़ियों को गर्त में धकेल सकता है।

आजकल लोग कोई भी सामाजिक काम या दान-पुण्य करने से पहले यह देखते हैं कि उन्हें बदले में कितना नाम और यश मिलेगा। ठाकुर जी इस दिखावे की भावना पर चोट करते हुए कहते हैं—

"नाम और यश की आशा में कोई भी काम करना ठीक नहीं है। जब तुम कोई भी कार्य पूरी तरह निःस्वार्थ भाव से, बिना किसी लालच के करते हो... तो उस कार्य की अच्छाई के अनुरूप नाम और यश खुद-ब-खुद एक सेवक की तरह तुम्हारी सेवा में आकर खड़े हो जाते हैं।"

वे 'निष्काम' (निःस्वार्थ) शब्द की एक बेहद कोमल परिभाषा देते हैं कि सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए सब कुछ छोड़ देना निष्काम होना नहीं है। असली जादू तो इस भाव में है— "संसार को प्रेम से सब कुछ दे दो, अपने लिए बदले में कोई चाहत मत रखो; फिर देखोगे कि पूरी दुनिया और सभी लोग धीरे-धीरे तुम्हारे अपने ही होते जा रहे हैं।"

हमारे वंश के गौरव, महाराजा अग्रसेन जी का पूरा जीवन इसी निःस्वार्थ और उत्तरदायी सोच का साक्षात स्वरूप था। उन्होंने जब अग्रोहा की स्थापना की, तो अपने नाम या यश के लिए नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति के कल्याण के लिए की थी। उन्होंने सर्वस्व समाज को दे दिया, और आज इतिहास गवाह है कि युगों बाद भी उनका नाम और यश अमर है।

मेरी प्यारी बहनों, हम सब अपने घरों की मार्गदर्शक हैं। आइए आज हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम अपने घरों में अपनी गलतियों पर पर्दा डालने के बजाय उन्हें स्वीकार करने की हिम्मत जगाएंगे। हम अपने बच्चों को नाम और दिखावे के पीछे भागना नहीं, बल्कि निःस्वार्थ भाव से सेवा करना सिखाएँगी। जब हमारे अग्रवाल परिवारों का हर सदस्य इस जिम्मेदारी और गुरु के इस सुंदर मार्ग को अपनाएगा, तो हमारा समाज और हमारा देश सचमुच खुशहाली और गौरव के शिखर पर पहुँच जाएगा।

सदैव आपकी शुभाकांक्षी,

पुष्पा बजाज (९४३६३०२७२१)

(संस्थापिका एवं अध्यक्षा : अग्रवाल चेतना अभियान (AIM) अंतर्गत शुभम चैरिटेबल एंड वेलफेयर एसोसिएशन)

 

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अग्र-बहनों से संवाद: 13

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