मेरी प्रिय बहनों,
हम सब अपने परिवारों को
जोड़े रखने के लिए, अपनों को खुश देखने के लिए दिन-रात मेहनत करती हैं। हर माँ, हर
पत्नी और हर बहू का यही सपना होता है कि उसका पूरा परिवार उससे खुश रहे और घर में
शांति बनी रहे। इसके लिए हम हर संभव प्रयास भी करती हैं।
लेकिन इस प्रयास की सही
दिशा क्या होनी चाहिए? मेरे 'Living Master' (ठाकुर जी) इस पर रिश्तों का एक बहुत ही व्यावहारिक और जादुई नियम बताते हैं। ठाकुर जी
कहते हैं— "तुम दूसरों से अपने लिए जैसा व्यवहार पाने की इच्छा रखते हो, दूसरों को भी वैसा ही व्यवहार देने की कोशिश करो—जीवन में बस इतना समझकर चलना
ही काफी है। ऐसा करने से हर कोई तुम्हें पसंद करेगा और तुमसे प्यार करेगा।"
यह कितना सीधा नियम है
बहनों! अगर हम चाहती हैं कि सब हमसे आदर और प्रेम से बात करें, तो हमें
भी सबको वही आदर और प्रेम देना होगा। ठाकुर जी आगे कहते हैं— "स्वयं ठीक रहकर, यानी अपने मूल्यों पर टिके रहकर, सभी को सच्चे (सत्) भाव से
खुश करने की कोशिश करो; फिर देखोगे कि पूरी दुनिया और परिवार के सभी लोग
तुम्हें खुश करने की कोशिश में जुट गए हैं।"
लेकिन इसी के साथ, ठाकुर
जी हमें एक बहुत बड़ी और गंभीर चेतावनी देते हैं, जो आज हर बहन और बेटी के
दिल में छप जानी चाहिए। वे कहते हैं—
"सावधान! अपना निजत्व (अपना अस्तित्व, अपना आत्मसम्मान और अपने संस्कार) खोकर किसी को खुश करने मत जाना, अन्यथा तुम्हारी दुर्दशा की कोई सीमा नहीं रहेगी।"
मेरी प्यारी बहनों, यह बात
आज के समय में हमारे लिए समझना बहुत ज़रूरी है। सबको खुश रखना एक अच्छी बात है, लेकिन
दूसरों की गलत बातों को सहना, उनके गलत व्यवहार के आगे घुटने टेक देना, या किसी
को खुश करने के लिए अपने स्वाभिमान और अपने सिद्धांतों का सौदा कर लेना बहुत बड़ा
अपराध है। जब हम अपना वजूद खोकर किसी को खुश करना चाहती हैं, तो
सामने वाला हमारा आदर करना बंद कर देता है। रिश्तों में प्रेम वहीं तक सुंदर है, जहाँ तक
उसमें दोनों तरफ का सम्मान सुरक्षित हो।
हमारे पूर्वज महाराजा
अग्रसेन जी का जीवन भी इसी संतुलन का सुंदर उदाहरण था। वे अपनी प्रजा को खुश रखने
के लिए हर संभव प्रयास करते थे, लेकिन जब बात न्याय, धर्म और राज्य के
स्वाभिमान की आती थी, तो वे अपने सिद्धांतों से रत्ती भर भी समझौता नहीं करते थे।
मेरी प्यारी बहनों, आइए आज
हम सब अपने घरों की लक्ष्मी बनकर यह संकल्प लें कि हम अपने परिवारों में प्रेम और
खुशियाँ तो बिखेरेंगी, लेकिन अपने आत्मसम्मान और अपनी मर्यादा की कीमत पर नहीं। हम अपनी बेटियों को
भी यही सिखाएँगी कि बेटा, सबका आदर करना हमारे संस्कार हैं, लेकिन अपने अस्तित्व और
स्वाभिमान को बनाए रखना हमारी शक्ति है। जब हमारे अग्रवाल परिवारों की बहनें इस
संतुलन को समझकर जिएंगी, तो हमारे घरों में सुख और सम्मान का एक ऐसा वातावरण बनेगा जहाँ हर रिश्ता
मज़बूत और गरिमामयी होगा।
सदैव
आपकी शुभाकांक्षी,
पुष्पा
बजाज (९४३६३०२७२१)
(संस्थापिका एवं अध्यक्षा : अग्रवाल चेतना अभियान (AIM)
अंतर्गत शुभम चैरिटेबल एंड वेलफेयर एसोसिएशन)


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