मेरी प्रिय बहनों,
आज मैं आपसे एक ऐसी सूक्ष्म बीमारी पर बात करने आई हूँ, जो बहुत चुपके से हमारे
भीतर प्रवेश करती है और हमारे अपनों को हमसे दूर कर देती है। वह बीमारी है— 'ज्ञानाभिमान' (अपनी समझदारी या ज्ञान का
घमंड)।
आज के समय में हम सब पढ़ी-लिखी हैं, दुनियादारी समझती हैं और अपने-अपने घरों को
संभाल रही हैं। लेकिन अक्सर जाने-अनजाने हमारे भीतर एक भाव आ जाता है कि "मैं
बड़ी हूँ, मुझे सब पता है", "बच्चों को कुछ समझ नहीं है", या "सामने वाले को
क्या तमीज़ है!" हम हर जगह अपनी बात को ऊपर रखना चाहती हैं।
इसी मानसिक स्थिति पर मेरे 'Living Master' (ठाकुर जी) एक ऐसा परम सत्य बताते हैं, जो हमारे अहंकार को पिघला देता है। ठाकुर जी कहते हैं— "यदि अपना मंगल (भला) चाहते हो, तो सबसे पहले
इस ज्ञानाभिमान को छोड़ो। जीवन में सभी की बातें सुनो और अंत में वही करो जो
तुम्हारे हृदय के विस्तार में, यानी तुम्हारे दिल को बड़ा करने में तुम्हारी
सहायता करे।"
ठाकुर जी आगे एक बहुत बड़ी चेतावनी देते हैं। वे कहते हैं कि— "यह जो ज्ञान का घमंड है ना, यह इंसान के सीखने के
रास्ते में सबसे बड़ा बाधक (रुकावट) है। इतना नुकसान तो इंसान का उसका कोई बड़ा
दुश्मन (रिपु) भी नहीं कर सकता, जितना उसका खुद का यह अहंकार कर देता है।"
ज़रा सोचिए बहनों, आज हमारे घरों में बच्चों और माता-पिता के बीच दूरियाँ
क्यों आ रही हैं? क्योंकि एक माँ या पिता के रूप में हम हमेशा 'शिक्षक'
बनकर बच्चों पर
हुक्म चलाना चाहते हैं। हम उनकी बात सुनना ही नहीं चाहते। इसी बात पर ठाकुर जी
हमें रिश्तों को संभालने का एक अद्भुत मंत्र देते हैं—
🌿 "यदि तुम किसी
को शिक्षा देना चाहते हो, तो कभी भी खुद 'शिक्षक' बनना मत चाहो।
क्योंकि 'मैं शिक्षक हूँ और मैं सब जानता हूँ'—यह अहंकार ही
सामने वाले को कभी कुछ सीखने नहीं देता।"
यह बात कितनी गहरी है! जब हम घर में शिक्षक या जज बन जाती हैं, तो बच्चे अपनी
बातें हमसे छुपाने लगते हैं। इसके विपरीत, जब हम एक सहेली बनकर, विनम्र होकर उनकी बातें
सुनती हैं, तो वे खुद-ब-खुद सही रास्ते पर आ जाते हैं। ठाकुर जी कहते हैं कि अपने 'अहं' को जितना दूर
रखोगे, तुम्हारी समझ, तुम्हारा ज्ञान और संसार को देखने का तुम्हारा नज़रिया उतना
ही बड़ा और विस्तृत होता जाएगा।
हमारे पूर्वज महाराजा अग्रसेन जी का जीवन भी इसी परम विनम्रता का उदाहरण था।
इतने बड़े राजा होने के बाद भी उनके भीतर 'ज्ञानाभिमान' का लेश मात्र भी नहीं था।
वे अपनी प्रजा के छोटे-से-छोटे व्यक्ति के सुख-दुख को भी एक शिक्षार्थी की तरह
सुनते थे और उसका समाधान करते थे।
मेरी प्यारी बहनों, आइए आज हम सब अपने घरों की मार्गदर्शक बनकर यह संकल्प लें
कि हम अपने परिवारों में 'हुक्म चलाने वाले शिक्षक' नहीं, बल्कि 'प्रेम बाँटने
वाले मार्गदर्शक' बनेंगी। हम अपने बच्चों की, अपने से छोटों की बातों को
भी आदर से सुनेंगी। जब हमारे अग्रवाल परिवारों से यह ज्ञानाभिमान विदा होगा और
उसकी जगह आतंरिक विनम्रता आएगी, तो हमारे घरों के आपसी मतभेद हमेशा के लिए समाप्त हो जाएंगे
और हर रिश्ता प्रेम की डोर से बंध जाएगा।
सदैव आपकी शुभाकांक्षी,
पुष्पा बजाज (९४३६३०२७२१)
(संस्थापिका एवं अध्यक्षा : अग्रवाल चेतना अभियान (AIM) अंतर्गत शुभम चैरिटेबल एंड वेलफेयर एसोसिएशन)


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