मेरी प्रिय बहनों,
आज की इस कड़ी में मैं आपसे एक ऐसे विषय पर बात करने आई हूँ जो हमारी आत्मा और
हमारे आध्यात्मिक कल्याण से जुड़ा है। अक्सर हम देखते हैं कि आज की हमारी पढ़ी-लिखी
और तर्क करने वाली नई पीढ़ी जब किसी संत, महात्मा या गुरु के पास जाती है, तो उनके मन में
एक 'परीक्षक' का भाव होता है। वे अपनी बुद्धि से गुरु को जांचना-परखना चाहते हैं कि
"देखें, इन्हें कितना ज्ञान है!"
लेकिन मेरे 'Living Master' (ठाकुर जी) इस कसौटी पर एक बहुत ही अनोखा और गहरा सच बताते हैं। ठाकुर जी कहते हैं— "यदि तुम एक परीक्षक बनकर, अपने अहंकार के साथ सद्गुरु
की परीक्षा करने जाओगे, तो तुम उनमें केवल अपने ही अहंकार को देखोगे और अंततः ठगे
जाओगे।"
इसका अर्थ यह है बहनों, कि जैसा हमारा चश्मा होता है, हमें सामने वाला भी वैसा ही
दिखाई देता है। अगर हम घमंड लेकर गुरु के पास जाएंगे, तो हमें उनकी महिमा कभी समझ
नहीं आएगी। ठाकुर जी गुरु-कृपा का मार्ग बताते हुए कहते हैं—
"यदि सद्गुरु की शरण में जाना है, तो अपनी
संकीर्णता और पुराने संस्कारों को छोड़कर, प्रेम का हृदय लेकर जाओ।
जितने संभव हो सके उतने दीन (विनम्र) और निरहंकार होकर जाने से ही, उनकी दया से
कोई तृप्त और संतुष्ट हो सकता है।"
ठाकुर जी आगे एक बहुत ही सुंदर और मर्मस्पर्शी उदाहरण देते हैं, वे कहते हैं—
"जिस प्रकार हीरा कोयले और गंदी चीज़ों के बीच छिपा रहता है
और जब तक उसे अच्छे से साफ़ न किया जाए, उसकी चमक बाहर नहीं आती;
उसी प्रकार सद्गुरु भी इस संसार में अति साधारण जीव की तरह रहते हैं। केवल
प्रेम के धोवन (प्रक्षालन) से ही उनकी असल दीप्ति प्रकट होती है और उससे पूरा जगत
उद्भासित हो उठता है। उन्हें केवल एक 'प्रेमी' ही पहचान सकता
है और पकड़ सकता है।"
वे कहते हैं कि गुरु को कभी अहंकार की कसौटी पर कसा नहीं जा सकता। जो अहंकारी
है, वह तो केवल दूसरे अहंकारी की परीक्षा ले सकता है। जिसने अपने अहंकार को गला
दिया है, उसे एक घमंडी व्यक्ति कैसे समझ पाएगा? उसके सामने तो गुरु वैसे ही लगेंगे जैसे किसी
परम मूर्ख के सामने कोई महापंडित खड़ा हो। इसलिए ठाकुर जी का सीधा आदेश है— "प्रेमी का संग करो, सत्संग करो, वे स्वयं
तुम्हारे भीतर प्रकट हो जाएंगे।"
हमारे अग्र-कुल के मार्गदर्शक महाराजा अग्रसेन जी ने भी अपने जीवन में सदैव
संतों और ऋषियों का परम आदर किया था। महालक्ष्मी की कृपा और गुरुओं के आशीर्वाद के
आगे वे हमेशा एक बालक की तरह विनम्र होकर खड़े होते थे। यही कारण था कि उनका
अग्रोहा साम्राज्य धन-धान्य के साथ-साथ संस्कारों से भी समृद्ध था।
मेरी प्यारी बहनों, हम अपने घरों की संस्कार-धानी हैं। आज हमें अपने बच्चों को
यह सिखाना होगा कि अध्यात्म और गुरु की शरण में तर्क और चालाकी नहीं, बल्कि समर्पण
और प्रेम काम आता है। आइए, हम सब अपने घरों में ऐसा वातावरण बनाएँ जहाँ गुरुओं के
प्रति, संतों के प्रति और अपने से बड़ों के प्रति मन में श्रद्धा और परम विनम्रता का
भाव हो। जब हमारे अग्रवाल परिवारों के बच्चे इस निरहंकारिता को सीखेंगे, तो ठाकुर जी की
असीम कृपा हमारे घरों पर स्वतः बरसने लगेगी।
विशेष आमंत्रण — अग्र वंदना 🌸
मेरी प्यारी अग्र बहनों,
अग्र चेतना अभियान के माध्यम से ‘अग्र वंदना’ की पावन यात्रा शिलांग से प्रारंभ होकर देवघर तक पहुँच चुकी है। अब इसका तीसरा पड़ाव गुवाहाटी है।
दिनांक : 22 अगस्त 2026, संगनेरिया
धर्मशाला, गुवाहाटी
आइए, हम सभी मातृशक्ति एक साथ
मिलकर महाराजा
अग्रसेन जी की महान विरासत, उनके आदर्शों
और संस्कारों का गायन, मनन एवं चिंतन
करें और संकल्प लें
कि इस अमूल्य धरोहर को कभी विस्मृत नहीं होने देंगे, बल्कि अपनी अगली पीढ़ी तक पहुँचाएँगे।
आप सभी बहनों का हृदय से आमंत्रण है।
यदि कोई बहन अपने शहर में भी ‘अग्र वंदना’ का आयोजन करना चाहती हैं, तो मुझसे संपर्क करें। अग्र वंदना की पुस्तक एवं आवश्यक सामग्री उपलब्ध कराई
जाएगी।
अग्र चेतना जागे… अग्रवंश जागे!
जय महाराजा अग्रसेन जी महाराज!
सदैव आपकी शुभाकांक्षी,
पुष्पा बजाज (९४३६३०२७२१)
(संस्थापिका एवं अध्यक्षा : अग्रवाल चेतना अभियान (AIM) अंतर्गत शुभम चैरिटेबल एंड वेलफेयर एसोसिएशन)


No comments:
Post a Comment