Monday, September 14, 2026

अग्र-बहनों से संवाद: 13

 




मेरी प्रिय बहनों,

हम सब अपने जीवन में आगे बढ़ना चाहती हैं, अपने बच्चों को तरक्की करते देखना चाहती हैं और समाज में एक अच्छा मुकाम पाना चाहती हैं। लेकिन कई बार हम यह हिसाब लगाने बैठ जाती हैं कि "मैंने इतनी मेहनत की, तो मुझे क्या मिला?", "मैंने समाज के लिए इतना किया, पर मेरा नाम कितना हुआ?" जब हम अपनी प्रगति को इस तरह बार-बार नापने लगती हैं, तो हमारे कदम वहीं रुक जाते हैं।

इसी मानवीय स्वभाव पर मेरे 'Living Master' (ठाकुर अनुकूल चन्द्र जी) जीवन जीने का एक बेहद सुंदर और संतुलित मार्ग बताते हैं। ठाकुर जी कहते हैं— "जीवन में बस आगे बढ़ते जाओ, लेकिन यह नापने मत बैठो कि तुम कितनी दूर पहुँचे हो; क्योंकि ऐसा करने से तुम अपनी ही प्रगति में उलझकर फिर पीछे रह जाओगे। जीवन के अनुभवों को महसूस करो, लेकिन उनमें इतने मत डूब जाओ (अभिभूत मत हो) कि तुम आगे चल ही न पाओ। यदि डूबना ही है, तो केवल ईश्वर के प्रेम में डूबो।"

ठाकुर जी आगे हमारे सेवा भाव और वाणी पर रिश्तों का एक अचूक नियम समझाते हुए कहते हैं— "जितनी तुम्हारी शक्ति हो, उतनी सबकी सेवा करो; लेकिन बहुत सावधान रहो कि तुम्हारे मन में कभी दूसरों से सेवा लेने की या बदले में कुछ पाने की इच्छा न जागे। दूसरों से हमेशा अनुरोध (प्रेम भरा आग्रह) करो, कभी किसी पर हुक्म चलाने मत जाओ।"

ज़रा सोचिए बहनों, आज हमारे परिवारों में कड़वाहट कहाँ आती है? जब हम दूसरों की कमियाँ निकालने लगती हैं या आलस में दिन काटती हैं। ठाकुर जी हमें हर गुण के बीच का सही संतुलन सिखाते हुए कहते हैं—

  • "कभी किसी की निंदा मत करो, लेकिन गलत बात का साथ भी मत दो।"
  • "धैर्यवान (धीर) बनो, लेकिन आलसी और काम को टालने वाले मत बनो।"
  • "काम में तेज़ी (क्षिप्रता) लाओ, लेकिन अधीर होकर चिड़चिड़े मत बनो, वरना सब कुछ नष्ट हो जाएगा।"
  • "बहादुर और वीर बनो, लेकिन हिंसक होकर हिंसक जानवरों जैसे मत बन जाओ। अपनी बात पर पक्के (स्थिरप्रतिज्ञ) रहो, पर जिद्दी मत बनो।"

ठाकुर जी अंत में वाणी और व्यवहार का एक ऐसा जादुई नियम बताते हैं जो हमारे व्यक्तित्व को चमका देता है। वे कहते हैं कि "खुद अपनी तारीफ़ करने में हमेशा कंजूस (कृपण) बनो, लेकिन जब दूसरों की तारीफ़ करने का समय आए, तो खुले दिल से दाता बन जाओ।" वे सिखाते हैं कि तुम खुद दुखों को सहन कर लो, लेकिन जो सहन नहीं कर सकता, उससे नफ़रत करने के बजाय उसकी सहायता करो, उसे सहानुभूति दो और उसका हौसला बढ़ाओ।

हमारे पूर्वज महाराजा अग्रसेन जी का पूरा जीवन इसी अद्भुत संतुलन और सेवा भाव की जीती-जागती मिसाल था। उन्होंने अग्रोहा साम्राज्य में कभी किसी पर हुक्म नहीं चलाया, बल्कि 'एक रुपया और एक ईंट' के माध्यम से सबके प्रति सहानुभूति और सामूहिक सेवा की नींव रखी। वे खुद अपनी प्रशंसा से कोसों दूर रहे, पर प्रजा के हर व्यक्ति को आगे बढ़ाया।

मेरी प्यारी बहनों, हम अपने घरों का गौरव हैं। आइए आज हम सब अपने परिवारों में इसी सुंदर संतुलन को उतारने का संकल्प लें। हम अपने बच्चों को आगे बढ़ना तो सिखाएँ, पर बिना किसी घमंड और दिखावे के। आइए, दूसरों की सेवा निस्वार्थ भाव से करें और अपनी वाणी में हुक्म की जगह प्रेम का अनुरोध लेकर आएँ। जब हमारे अग्रवाल परिवारों की माताएँ इस सहज और संतुलित मार्ग पर चलेंगी, तो हमारे घरों का कोना-कोना सुख और आत्मिक आनंद से महक उठेगा।

सदैव आपकी शुभाकांक्षी,

पुष्पा बजाज (९४३६३०२७२१)

(संस्थापिका एवं अध्यक्षा : अग्रवाल चेतना अभियान (AIM) अंतर्गत शुभम चैरिटेबल एंड वेलफेयर एसोसिएशन)

अग्र-बहनों से संवाद: 12

 



मेरी प्रिय बहनों,

हम सब अपने परिवारों को जोड़े रखने के लिए, अपनों को खुश देखने के लिए दिन-रात मेहनत करती हैं। हर माँ, हर पत्नी और हर बहू का यही सपना होता है कि उसका पूरा परिवार उससे खुश रहे और घर में शांति बनी रहे। इसके लिए हम हर संभव प्रयास भी करती हैं।

लेकिन इस प्रयास की सही दिशा क्या होनी चाहिए? मेरे 'Living Master' (ठाकुर जी) इस पर रिश्तों का एक बहुत ही व्यावहारिक और जादुई नियम बताते हैं। ठाकुर जी कहते हैं— "तुम दूसरों से अपने लिए जैसा व्यवहार पाने की इच्छा रखते हो, दूसरों को भी वैसा ही व्यवहार देने की कोशिश करो—जीवन में बस इतना समझकर चलना ही काफी है। ऐसा करने से हर कोई तुम्हें पसंद करेगा और तुमसे प्यार करेगा।"

यह कितना सीधा नियम है बहनों! अगर हम चाहती हैं कि सब हमसे आदर और प्रेम से बात करें, तो हमें भी सबको वही आदर और प्रेम देना होगा। ठाकुर जी आगे कहते हैं— "स्वयं ठीक रहकर, यानी अपने मूल्यों पर टिके रहकर, सभी को सच्चे (सत्) भाव से खुश करने की कोशिश करो; फिर देखोगे कि पूरी दुनिया और परिवार के सभी लोग तुम्हें खुश करने की कोशिश में जुट गए हैं।"

लेकिन इसी के साथ, ठाकुर जी हमें एक बहुत बड़ी और गंभीर चेतावनी देते हैं, जो आज हर बहन और बेटी के दिल में छप जानी चाहिए। वे कहते हैं—

"सावधान! अपना निजत्व (अपना अस्तित्व, अपना आत्मसम्मान और अपने संस्कार) खोकर किसी को खुश करने मत जाना, अन्यथा तुम्हारी दुर्दशा की कोई सीमा नहीं रहेगी।"

मेरी प्यारी बहनों, यह बात आज के समय में हमारे लिए समझना बहुत ज़रूरी है। सबको खुश रखना एक अच्छी बात है, लेकिन दूसरों की गलत बातों को सहना, उनके गलत व्यवहार के आगे घुटने टेक देना, या किसी को खुश करने के लिए अपने स्वाभिमान और अपने सिद्धांतों का सौदा कर लेना बहुत बड़ा अपराध है। जब हम अपना वजूद खोकर किसी को खुश करना चाहती हैं, तो सामने वाला हमारा आदर करना बंद कर देता है। रिश्तों में प्रेम वहीं तक सुंदर है, जहाँ तक उसमें दोनों तरफ का सम्मान सुरक्षित हो।

हमारे पूर्वज महाराजा अग्रसेन जी का जीवन भी इसी संतुलन का सुंदर उदाहरण था। वे अपनी प्रजा को खुश रखने के लिए हर संभव प्रयास करते थे, लेकिन जब बात न्याय, धर्म और राज्य के स्वाभिमान की आती थी, तो वे अपने सिद्धांतों से रत्ती भर भी समझौता नहीं करते थे।

मेरी प्यारी बहनों, आइए आज हम सब अपने घरों की लक्ष्मी बनकर यह संकल्प लें कि हम अपने परिवारों में प्रेम और खुशियाँ तो बिखेरेंगी, लेकिन अपने आत्मसम्मान और अपनी मर्यादा की कीमत पर नहीं। हम अपनी बेटियों को भी यही सिखाएँगी कि बेटा, सबका आदर करना हमारे संस्कार हैं, लेकिन अपने अस्तित्व और स्वाभिमान को बनाए रखना हमारी शक्ति है। जब हमारे अग्रवाल परिवारों की बहनें इस संतुलन को समझकर जिएंगी, तो हमारे घरों में सुख और सम्मान का एक ऐसा वातावरण बनेगा जहाँ हर रिश्ता मज़बूत और गरिमामयी होगा।

सदैव आपकी शुभाकांक्षी,

पुष्पा बजाज (९४३६३०२७२१)

(संस्थापिका एवं अध्यक्षा : अग्रवाल चेतना अभियान (AIM) अंतर्गत शुभम चैरिटेबल एंड वेलफेयर एसोसिएशन)

 

अग्र-बहनों से संवाद: 11

 



मेरी प्रिय बहनों,

कई बार हम अपने घरों में देखती हैं कि हमसे या हमारे बच्चों से कोई गलती हो जाती है। इंसान होने के नाते गलतियाँ होना स्वाभाविक है, लेकिन सबसे खतरनाक बात तब होती है जब हम अपनी उस गलती को छुपाने के लिए, या अपने अहंकार को बचाने के लिए उसका समर्थन करने लगती हैं, यानी उसे सही ठहराने की दलीलें देने लगती हैं।

इसी मानवीय कमज़ोरी पर मेरे 'Living Master' (ठाकुर जी) हमें एक बहुत बड़ी चेतावनी देते हैं। ठाकुर जी कहते हैं— "यदि तुम अपना दोष (गलती) जानकर भी उसे तुरंत छोड़ नहीं सकते, तो कम से कम किसी भी तरह उसका समर्थन करके दूसरों का सर्वनाश मत करो।"

यह कितनी बड़ी बात है बहनों! जब हम अपनी गलत आदतों या गलतियों का पक्ष लेती हैं, तो हमारे बच्चे भी वही सीखते हैं और पूरा पारिवारिक ताना-बाना बिखर जाता है। इसके विपरीत, ठाकुर जी हमें समाज को सुधारने का एक बहुत ही व्यावहारिक और जादुई तरीका बताते हैं। वे कहते हैं— "यदि तुम खुद 'सत्' (सच्चे और अच्छे) बन जाओ, तो तुम्हारी देखा-देखी हज़ारों लोग अपने आप अच्छे हो जाएंगे। लेकिन अगर तुम 'असत्' (बुरे या स्वार्थी) बनोगे, तो याद रखना कि तुम्हारी दुर्दशा पर आँसू बहाने वाला या हमदर्दी जताने वाला भी कोई नहीं बचेगा; क्योंकि अपने स्वार्थ से तुमने अपने चारों तरफ के माहौल को ही वैसा बना दिया है।"

ठाकुर जी आज के हर माता-पिता और युवा को उनकी असली ताकत और जिम्मेदारी याद दिलाते हुए कहते हैं कि यह बात गाँठ बांध लो— "तुम खुद अपने, अपने पूरे परिवार के, समाज के और पूरे देश के वर्तमान और भविष्य के लिए पूरी तरह उत्तरदायी (जिम्मेदार) हो।" हमारा एक सही कदम पूरे परिवार को तार सकता है और हमारा एक गलत कदम पीढ़ियों को गर्त में धकेल सकता है।

आजकल लोग कोई भी सामाजिक काम या दान-पुण्य करने से पहले यह देखते हैं कि उन्हें बदले में कितना नाम और यश मिलेगा। ठाकुर जी इस दिखावे की भावना पर चोट करते हुए कहते हैं—

"नाम और यश की आशा में कोई भी काम करना ठीक नहीं है। जब तुम कोई भी कार्य पूरी तरह निःस्वार्थ भाव से, बिना किसी लालच के करते हो... तो उस कार्य की अच्छाई के अनुरूप नाम और यश खुद-ब-खुद एक सेवक की तरह तुम्हारी सेवा में आकर खड़े हो जाते हैं।"

वे 'निष्काम' (निःस्वार्थ) शब्द की एक बेहद कोमल परिभाषा देते हैं कि सिर्फ दुनिया को दिखाने के लिए सब कुछ छोड़ देना निष्काम होना नहीं है। असली जादू तो इस भाव में है— "संसार को प्रेम से सब कुछ दे दो, अपने लिए बदले में कोई चाहत मत रखो; फिर देखोगे कि पूरी दुनिया और सभी लोग धीरे-धीरे तुम्हारे अपने ही होते जा रहे हैं।"

हमारे वंश के गौरव, महाराजा अग्रसेन जी का पूरा जीवन इसी निःस्वार्थ और उत्तरदायी सोच का साक्षात स्वरूप था। उन्होंने जब अग्रोहा की स्थापना की, तो अपने नाम या यश के लिए नहीं, बल्कि समाज के अंतिम व्यक्ति के कल्याण के लिए की थी। उन्होंने सर्वस्व समाज को दे दिया, और आज इतिहास गवाह है कि युगों बाद भी उनका नाम और यश अमर है।

मेरी प्यारी बहनों, हम सब अपने घरों की मार्गदर्शक हैं। आइए आज हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम अपने घरों में अपनी गलतियों पर पर्दा डालने के बजाय उन्हें स्वीकार करने की हिम्मत जगाएंगे। हम अपने बच्चों को नाम और दिखावे के पीछे भागना नहीं, बल्कि निःस्वार्थ भाव से सेवा करना सिखाएँगी। जब हमारे अग्रवाल परिवारों का हर सदस्य इस जिम्मेदारी और गुरु के इस सुंदर मार्ग को अपनाएगा, तो हमारा समाज और हमारा देश सचमुच खुशहाली और गौरव के शिखर पर पहुँच जाएगा।

सदैव आपकी शुभाकांक्षी,

पुष्पा बजाज (९४३६३०२७२१)

(संस्थापिका एवं अध्यक्षा : अग्रवाल चेतना अभियान (AIM) अंतर्गत शुभम चैरिटेबल एंड वेलफेयर एसोसिएशन)

 

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