मेरी प्रिय अग्र-बहनों,
क्या आपने कभी अपनी रगों में बहते उस रक्त को महसूस किया है, जो केवल रक्त नहीं, बल्कि एक गौरवशाली इतिहास की अनवरत यात्रा है?
बहनों! जीवन की यात्रा में दो ही चीजें सबसे अनमोल होती
हैं—एक वह 'बीज' जो हमें विरासत में मिलता है, और दूसरा वह 'माली' जो उस बीज को एक विशाल, फलदार और
छायादार वृक्ष बनाने की कला जानता है।
सच्चाई यह है कि वह दिव्य बीज—जिसमें सात पीढ़ियों के
संस्कार, असीमित
सामर्थ्य, व्यापारिक
सूझबूझ, सेवा-भाव, करुणा और नेतृत्व क्षमता निहित है—हम सभी
अग्रवंशियों के भीतर जन्मजात रूप से विद्यमान है। वह हमारे अस्तित्व का अभिन्न
हिस्सा है।
किन्तु कोई भी बीज, चाहे वह कितना ही अनमोल क्यों न हो, तब तक वृक्ष नहीं बन सकता जब तक उसे कोई संवेदनशील माली न मिले, जो अपनी करुणा की ओस और ज्ञान की धूप से उसे
सींचकर उसकी सुप्त शक्ति को जागृत कर दे।
मुझे गर्व है कि मैं महाराजा अग्रसेन की उस गौरवशाली परंपरा
की वंशज हूँ, जिसने संसार को
केवल धन कमाने की कला नहीं, बल्कि धन के
साथ धर्म, सेवा, सदाचार और सामाजिक उत्तरदायित्व का मार्ग भी
दिखाया।
'एक रुपया और एक
ईंट' का वह कालजयी
सिद्धांत—जिसने केवल व्यापार करना नहीं सिखाया, बल्कि वैभव के बीच संस्कार, सदाचार, अटूट भाईचारे और निष्कलंक चरित्र निर्माण की नींव रखी—
आज भी हम सभी अग्रवंशियों की सोच, संस्कारों और जीवन-दृष्टि में जीवंत है।
परंतु आज मैं आपके समक्ष एक आत्म-स्वीकारोक्ति करना चाहती
हूँ।
वर्षों तक यह अपार ऊर्जा और यह अग्र-गौरव मेरे परिवार के
भीतर भी एक सुप्त बीज की भाँति निःशब्द पड़ा रहा। हम भी जीवन की व्यस्तताओं और
दिनचर्या में उलझे हुए थे।
किन्तु अंधेरी कोठरी में रखी माचिस की तीली तब तक प्रकाश
नहीं देती, जब तक उसे
घर्षण का स्पर्श न मिले। हमारे जीवन में उस सुप्त बीज को अंकुरित करने वाली
प्रेरणा, वह प्रथम
चिंगारी, और उस बीज को
सींचकर विकसित करने वाले कुशल माली के रूप में हमारे 'लिविंग मास्टर' (ठाकुर जी) का आगमन हुआ।
ठाकुर जी के सान्निध्य, उनकी करुणामयी दृष्टि और उनके दिव्य मार्गदर्शन
ने हमारे परिवार के भीतर सुप्त पड़ी अग्र-चेतना को स्पंदित कर दिया। उनकी प्रेरणा
तथा आचार्य देव के निरंतर मार्गदर्शन ने हमें अपने सामाजिक, पारिवारिक और राष्ट्रीय कर्तव्यों का बोध कराया।
उन्होंने हमें यह अनुभूति कराई कि हमारे पूर्वजों के
सिद्धांत केवल अतीत की गौरवगाथाएँ नहीं हैं, बल्कि वर्तमान को दिशा देने और भविष्य का निर्माण करने वाले जीवंत सूत्र हैं।
उन्हीं की प्रेरणा से प्रारंभ हुई सेवा-यात्रा का मूर्त
स्वरूप है—"शुभम"।
आज "शुभम" के माध्यम से मेघालय की दुर्गम
पहाड़ियों में जो भी सेवा कार्य हो रहे हैं—चाहे ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर
बनाना हो, उन्हें
सम्मानजनक आजीविका से जोड़ना हो, या 'जीरो-वेस्ट' की अवधारणा के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण का
कार्य करना हो—वे किसी व्यक्ति विशेष की उपलब्धि नहीं हैं।
वे वास्तव में महाराजा अग्रसेन जी के शाश्वत आदर्शों और
ठाकुर जी की जीवंत प्रेरणा का एक पवित्र संगम हैं।
मेरी युवा बहनों और भाइयों, मेरा दृढ़ विश्वास है कि जिस दिव्य प्रकाश ने
हमारे जीवन को सेवा और उद्देश्य की दिशा दी, वही प्रकाश समाज के प्रत्येक युवा तक पहुँचना चाहिए, जो आज जीवन में दिशा की तलाश कर रहा है।
मैं चाहती हूँ कि आप भी उस जीवंत ऊर्जा के सान्निध्य से
जुड़ें। जब हमारी अग्र-रक्तधारा गुरु-ज्ञान के प्रकाश से आलोकित होगी, तब हमारे भीतर सुप्त पड़े गुण एक ऐसे विशाल
वृक्ष के रूप में विकसित होंगे,
जिसकी छाया में समाज का प्रत्येक व्यक्ति सुख, शांति और प्रेरणा प्राप्त कर सकेगा।
आइए, दिखावे की
क्षणभंगुर चकाचौंध से ऊपर उठें। अपनी जड़ों को पहचानें, अपने संस्कारों को पहचानें, अपने भीतर प्रवाहित अग्र-तेज को पहचानें और
स्वयं को एक ऐसे वटवृक्ष के रूप में विकसित करें, जो समाज को दिशा देने का सामर्थ्य रखता हो।
याद रखिए—
महान वृक्ष अपनी जड़ों का स्वभाव कभी नहीं भूलते।
महाराजा अग्रसेन जी ने समाज को जो करुणा, अनुशासन, सहयोग और पुरुषार्थ का अमूल्य संदेश दिया था, वह आज भी हमारी चेतना में विद्यमान है।
यह 52 सप्ताह की
वैचारिक यात्रा उसी सुप्त तेज को जागृत करने, उसे आधुनिक जीवन की कसौटी पर परखने और केवल इच्छाओं की दुनिया से निकालकर कर्म, सेवा और पुरुषार्थ के मार्ग पर अग्रसर करने का
एक विनम्र प्रयास है।
सदैव आपकी शुभाकांक्षी,
पुष्पा बजाज


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