पिछली
कड़ी में मैंने हमारे घरों में चुपचाप प्रवेश कर रही उन अनजानी समस्याओं की चर्चा
की थी, जो धीरे-धीरे हमारे
पारिवारिक जीवन को प्रभावित कर रही हैं। आज मन चाहता है कि उस विषय को और गहराई से
छूएँ—उस पीड़ा को समझें, जिससे
आज लगभग हर घर किसी न किसी रूप में जूझ रहा है।
सच्चाई
यह है कि वर्तमान युग अत्यधिक प्रतिस्पर्धा का युग बन चुका है। हर ओर आगे निकलने
की होड़ है, सफलता की दौड़ है,
और इस निरंतर दबाव के बीच हमारे बच्चे
मानसिक रूप से थकते जा रहे हैं। छोटी-सी असफलता भी उन्हें भीतर तक तोड़ देती है।
कई बार वे भय, निराशा
और अवसाद के ऐसे अंधकार में चले जाते हैं, जहाँ से बाहर निकलना कठिन हो जाता है।
जब
किसी माँ को अपने बच्चे का बुझता हुआ आत्मविश्वास दिखाई देता है, जब वह उसके चेहरे से मुस्कान गायब होते
देखती है, तब उसके हृदय पर क्या
बीतती होगी—इसे शब्दों में व्यक्त करना कठिन है। बाहरी रूप से हम चाहे कितने भी
संपन्न और सफल क्यों न दिखाई दें, परंतु
कटु सत्य यह है कि हमारी नई पीढ़ी भीतर से मानसिक रूप से दुर्बल होती जा रही है।
मेरे
‘Living Master’ (ठाकुर
जी) इस विषय पर हमें सावधान करते हुए कहते हैं—
“मनुष्य के जीवन का सबसे बड़ा शत्रु कोई
बाहरी परिस्थिति नहीं, बल्कि उसके अपने भीतर बैठी हुई दुर्बलता
है।”
ठाकुर
जी तो मानसिक कायरता और दुर्बलता को “पाप की ज्वलंत प्रतिमूर्ति” कहते हैं। यह ऐसा
धीमा विष है जो व्यक्ति के साहस, आत्मविश्वास
और जीवन शक्ति को धीरे-धीरे नष्ट कर देता है।
एक
क्षण रुककर विचार कीजिए। हम जिन महाराजा अग्रसेन जी के वंशज हैं, क्या उनके जीवन में संघर्षों का अभाव था?
जब उन्होंने राजवैभव का त्याग कर नए
सिरे से अग्रोहा की स्थापना की, तब
क्या हमारे पूर्वज केवल सुविधाओं और दिखावे के पीछे भागे थे? नहीं। उस समय समाज को पुनः खड़ा करने
वाली शक्ति थी—साहस, आत्मबल,
त्याग और श्रेष्ठ संस्कार।
किन्तु
आज हम जाने-अनजाने अपने बच्चों को केवल सफलता, प्रतिस्पर्धा और धन अर्जित करने की
शिक्षा दे रहे हैं। हम उन्हें डॉक्टर, इंजीनियर, अधिकारी
या व्यवसायी तो बनाना चाहते हैं, परंतु
उन्हें मानसिक रूप से सशक्त, धैर्यवान
और जीवन के संघर्षों का सामना करने योग्य बनाना भूलते जा रहे हैं।
यहीं
पर हमें समझ आता है कि इस तनावपूर्ण और दिशाहीन होते युग में एक जीवंत गुरु का
मार्गदर्शन कितना आवश्यक है। जब जीवन के मूल्य धुंधले पड़ने लगते हैं, तब गुरु ही वह प्रकाश बनते हैं जो सही
दिशा दिखाते हैं।
ठाकुर
जी का पहला और अमर संदेश है—
“साहसी बनो,
वीर
बनो, स्मरण करो कि तुम उस परमपिता की संतान
हो।”
यह
केवल एक प्रेरक वाक्य नहीं, बल्कि
जीवन का आधार है। हमारे बच्चे केवल अंकों की मशीन नहीं हैं, न ही वे केवल प्रतियोगिताओं के लिए बने
हैं। वे परमात्मा के अंश हैं, असीम
संभावनाओं से परिपूर्ण हैं। जब एक माँ इस सत्य को समझ लेती है और अपने बच्चों को
भी इसका बोध कराती है, तब
उनके भीतर से भय, हीनता,
अवसाद और निराशा स्वतः दूर होने लगते
हैं।
मेरी
प्रिय बहनों,
यदि
हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को मानसिक रूप से स्वस्थ, आत्मविश्वासी और संस्कारवान बनाना चाहती
हैं; यदि हम चाहते हैं कि
हमारे घरों की खुशियाँ बनी रहें, परिवारों
का प्रेम अक्षुण्ण रहे और हमारे बच्चों के जीवन में आत्मबल का प्रकाश सदैव जलता
रहे, तो हमें अपने घरों
में ठाकुर जी के इन जीवनदायी सूत्रों को स्थान देना होगा।
आइए,
हम दिखावे और तुलना की इस विनाशकारी
दौड़ को अपने घर की चौखट के बाहर ही रोक दें। एक माँ, एक बहन और एक संस्कारदात्री के रूप में
आज यह संकल्प लें कि हम अपने बच्चों को केवल सफल नहीं, बल्कि साहसी, संतुलित और चरित्रवान भी बनाएँगे।
हमारी
रगों में महाराजा अग्रसेन का तेज प्रवाहित हो रहा है। आवश्यकता केवल इतनी है कि हम
ठाकुर जी की गुरु-वाणी के माध्यम से उस तेज को पुनः जागृत करें।
उठिए,
जागिए
और अपने घर से ही इस आंतरिक दुर्बलता के विरुद्ध एक नई शुरुआत कीजिए।
सदैव आपकी शुभाकांक्षी,
पुष्पा बजाज


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