Monday, September 14, 2026

अग्र-बहनों से संवाद : 6

 



मेरी प्रिय बहनों,

पिछली कड़ी में हमने बात की थी कि कैसे हमारी अंतहीन इच्छाएँ और मन का संकोच हमारे दुखों का कारण बनते हैं। आज आइए, ठाकुर जी के उसी सूत्र की उस परम गहराई में उतरते हैं, जो हमारे बच्चों को डिप्रेशन (अवसाद) से बचाने और हमारे जीवन में सदा स्थिर रहने वाली शांति की चाबी है।

आज हम माताएँ दिन-रात एक ही चिंता में घुली जाती हैं—"हमारे बच्चों का भविष्य क्या होगा?", "अगर व्यापार में कोई मंदी आ गई तो क्या होगा?", "हमारी योजनाएँ अगर सफल नहीं हुईं तो हम समाज को क्या मुंह दिखाएंगे?" हम हर चीज़ को अपनी बुद्धिमानी से नियंत्रित (control) करना चाहती हैं, और जब चीज़ें हमारे हिसाब से नहीं होतीं, तो हम गहरी निराशा और तनाव से घिर जाती हैं।

यहीं पर मेरे 'Living Master' (ठाकुर अनुकूल चन्द्रजी) हमारे बिखरे हुए मन को थामने के लिए एक बहुत ही सुंदर और जादुई प्रार्थना सिखाते हैं। वे कहते हैं कि जब भी मन घबराए, तो शांत होकर बैठ जाओ और अपने परमपिता (ईश्वर) से सीधे दिल से यह कहो—

 "हे परमपिता! तुम्हारी इच्छा ही मेरा मंगल है। मैं नासमझ हूँ, मैं सचमुच नहीं जानती कि मेरा और मेरे परिवार का भला किस चीज़ में है। इसलिए मेरे जीवन में मेरी ज़िद नहीं, बल्कि तुम्हारी दिव्य इच्छा ही पूर्ण हो।"

मेरी बहनों, इस एक छोटी सी प्रार्थना में समर्पण का जो आनंद छिपा है, वह दुनिया के किसी वैभव में नहीं है। जब हम ईश्वर को अपने जीवन की पतवार सौंपकर उनकी मर्ज़ी में 'राजी' हो जाती हैं, तो हमारा सारा मानसिक बोझ उतर जाता है। फिर दुनिया का कोई भी दुख, कोई भी असफलता हमें छू भी नहीं सकती; क्योंकि हम जानते हैं कि जो हुआ, वह हमारे ठाकुर जी की मर्ज़ी से हुआ और उसमें निश्चित ही हमारा कोई मंगल छिपा है।

इसके साथ ही, ठाकुर जी हमें कर्म और व्यवहार का एक ऐसा अटूट नियम बताते हैं जो हमारे घरों के आपसी कलह को हमेशा के लिए समाप्त कर सकता है। वे कहते हैं— "किसी के भी दुःख का कारण मत बनो, तो ब्रह्मांड में कोई भी तुम्हारे दुःख का कारण नहीं बनेगा।"

यह कितना सीधा और सच्चा कर्मफल का सिद्धांत है! जाने-अनजाने जब हम अपनी ज़ुबान से, अपने व्यवहार से या अपने तानों से किसी दूसरी बहन, जेठानी, देवरानी या बहू का दिल दुखाती हैं, तो हम खुद अपने लिए दुखों का बीज बो रही होती हैं।

ठाकुर जी अंत में एक बहुत बड़ी हकीकत हमारे सामने रखते हैं। वे कहते हैं कि— "अभाव या चाहत का जो भाव हमारे अंदर बैठ गया है, वही असली दुख है। तुम दुनिया के लिए चाहे हज़ार अच्छे काम कर लो, बड़ी-बड़ी संस्थाएँ बना लो, लेकिन जब तक तुम अपने हृदय के भीतर से उस 'अभाव और शिकायत की भावना' को निकाल नहीं लेतीं, तब तक तुम्हारा दुख दूर नहीं हो सकता। और यह चमत्कार केवल और केवल 'धर्म' यानी गुरु का जीवंत ज्ञान ही कर सकता है।"

हमारे पूर्वज महाराजा अग्रसेन जी ने भी अपने जीवन का हर निर्णय इसी मंगल-भावना और धर्म के आधार पर लिया था। वे जानते थे कि जब हृदय में ईश्वर का वास और धर्म की नीति होती है, तो अभाव कभी टिक ही नहीं सकता।

मेरी प्यारी बहनों, आइए आज हम सब अपने घरों की लक्ष्मी बनकर यह संकल्प लें कि हम अपने बच्चों को केवल भौतिक सुखों के पीछे भागना नहीं, बल्कि ईश्वर पर अटूट विश्वास रखना सिखाएंगी। जब हमारे बच्चे यह सीख जाएंगे कि हर हाल में मुस्कुराना और परमपिता की इच्छा पर भरोसा रखना ही असली ताकत है, तो डिप्रेशन जैसी बीमारी हमारे अग्रवाल परिवारों की चौखट को कभी पार नहीं कर पाएगी।

 

सदैव आपकी शुभाकांक्षी,

पुष्पा बजाज (94363 02721)

संस्थापिका एवं अध्यक्षा: शुभम चैरिटेबल एंड वेलफेयर एसोसिएशन

 

No comments:

Post a Comment

About Me

My photo
Analyst, Editor and Publisher : Sandeepan: First Hindi Blog of North East India

अग्र-बहनों से संवाद: 13

  मेरी प्रिय बहनों , हम सब अपने जीवन में आगे बढ़ना चाहती हैं , अपने बच्चों को तरक्की करते देखना चाहती हैं और समाज में एक अच्छा मुकाम पान...